Proper care in pregnancy/ गर्भवती की देखभाल

जानें गर्भकाल में कैसा हो -- गर्भवती का आहार-विहार एवं आचार-विचार 




गर्भावस्था नारी जीवन का बहुत हीं महत्वपूर्ण काल होता है। अपने अन्दर अपने अंश को पालना और फिर उचित समय पर उसे जन्म देना हर नारी का सपना होता है। सभी माता-पिता की चाहत होती है कि उनकी संतान स्वस्थ एवं संस्कारी हो। बच्चा स्वस्थ एवं संस्कारी हो इसके लिए गर्भकाल से हीं गर्भवती को अपने आहार-विहार एवं आचार-विचार पर ध्यान देना चाहिए। पति-पत्नी जिस प्रकार के आहार, व्यवहार एवं चेष्टाओं से युक्त होकर समागम करते हैं वैसी हीं मानसिकता गर्भस्थ शिशु में उत्पन्न होती है।



          पहली बार गर्भवती होने वाली स्त्री को चिंता एवं भय सताता है। ऐसे में परिवार के बडों को गर्भवती का मनोबल बढ़ाकर उसके मन की दुविधा एवं आशंकाओं को दूर करना चाहिए। गर्भवती को खुद भी अपना मनोबल मजबूत रखना चाहिए क्योंकि गर्भ प्रकृति का दिया हुआ बहुमूल्य उपहार होता हैं। गर्भकाल में शिशु और खुद के योग्य उचित आहार-विहार का पालन करके वह एक सुंदर, सुडौल और स्वस्थ शिशु को आसानी से जन्म देने वाली है। गर्भावस्था के प्रारम्भिक काल में गर्भवती को विभिन्न प्रकार के गंध एवं भोजन से अरुचि हो जाती है। जी मिचलाना एवं उल्टी की शिकायत रहती है। भोजन के बाद सौंफ एवं मिश्री को खूब चबाकर खाने से पाचन क्रिया दुरुस्त होता है एवं उल्टी की शिकायत दूर होती है।  गर्भावस्था में सौंफ का उपयोग करने से संतान गौरवर्ण का होता है।
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          गर्भवती को अधिक समय तक भूखे नहीं रहना चाहिए। साथ हीं अधिक मात्रा में भी भोजन नहीं करना चाहिए। गर्भवती को दूध, दाल, फल, सब्जी एवं सलाद का अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए। गरिष्ठ एवं ज्यादा तेल-मसाले का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कब्ज उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन नहीं करे। गर्भवती को मांसाहार का प्रयोग नहीं करना चाहिए। शुुुरू के तीन-चार महीने आधा से एक ग्राम वंशलोचन का चूर्ण रात्रि में सोने से पहले दूध के साथ लेने से गर्भपात का भय नहीं रहता है।
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            गर्भवती को कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये जिससे गर्भस्थ शिशु को तकलीफ हो। भारी वजन उठाने एवं परिश्रम वाले कार्य नहीं करना चाहिए। गर्भवती को आलस्य भी नहीं करना चाहिए। शरीर में चुस्ती-फुर्ती एवं शक्ति बनाये रखने के लिए घर के हल्के-फुलके कार्य हमेशा करते रहना चाहिए।

           चार महीने का गर्भकाल पूरा होने के बाद स्त्री 'दोहृदनी' यानी दो हृदय वाली हो जाती है अतः उसकी उचित इच्छाओं की पूर्ति अवश्य करनी चाहिए। गर्भवती को ऐसे समय में उचित आहार-विहार के साथ उचित आचार-विचार का भी पालन करना चाहिए क्योंकि इसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु के मन पर पड़ता है। गर्भकाल में गर्भवती जैसी मानसिक स्थिति से गुजरेगी, शिशु की मानसिकता भी वैसी हीं बन जाती है। यही वह समय होता है जब होने वाली संतान के अंदर अच्छे गुण, कर्म और स्वभाव को स्थापित किया जा सकता है।    
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           गर्भवती को रात्रि जागरण, क्रोध, चिंता एवं पेट पर दबाव डालने वाले कार्य नहीं करना चाहिए। अपंग एवं विकृत रूप वाले लोगों से दूर रहना चाहिए। धार्मिक पुस्तक पढ़ना एवं मनोरम दृश्य देखना गर्भस्थ शिशु के लिए लाभप्रद होता है। गर्भावस्था में ज्ञानार्जन करना गर्भस्थ शिशु के मष्तिष्क वृद्धि में सहायता करता है। परंतु ध्यान रहे गर्भवती को किसी भी प्रकार का मानसिक तनाव नहीं लेना चाहिए। 
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           प्रतिदिन एक चम्मच मक्खन, एक चम्मच मिश्री पाउडर एवं आधा चम्मच काली मिर्च पाउडर को सुबह में सेवन करना गर्भवती के लिए लाभप्रद होता है। इसके बाद कच्चे नारियल एवं सौंफ को चबाकर खाना चाहिए। गर्भवती  को प्रतिदिन दूध का सेवन अवश्य करना चाहिए। गर्भवती को अधिक गर्म दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। दूध के साथ सतावरी का सेवन गर्भवती के लिए बेहद लाभप्रद होता है। सतावरी चूर्ण को दूध में डालकर उबालें फिर ठंढा करके घी मिलाकर सेवन करें। दूध के साथ शहद का प्रयोग भी लाभप्रद होता है। परंतु ध्यान रहे शहद का सेवन गर्म दूध के साथ नहीं करना चाहिए। दूध को सामान्य तापमान में लाने के बाद शहद मिलाना चाहिये।
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        अंत में सबसे जरूरी है गर्भवती को हमेशा प्रसन्नचित एवं खुश रहना चाहिए। गर्भवती की खुशी गर्भस्थ शिशु के विकास में अहम भूमिका निभाता है। गर्भवती को सभी नियमों का पालन करते हुए एवं सावधानियां रखते हुए किसी लेडी डॉक्टर की देख-रेख में रहना चाहिए।

Proper care in pregnancy/ गर्भवती की देखभाल Proper care in pregnancy/ गर्भवती की देखभाल Reviewed by Ragini Rani on March 24, 2019 Rating: 5

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